राजस्थान

Rajasthan Congress: कांग्रेस के संगठन निर्माण अभियान में बवाल, ज़िलाध्यक्षों की सूची बनी पार्टी के लिए परेशानी

Rajasthan Congress: राज्य कांग्रेस द्वारा जारी किए गए संगठन निर्माण अभियान के तहत ज़िलाध्यक्षों की सूची पार्टी के लिए बड़ी परेशानी बन गई है। जैसे ही यह सूची जारी हुई, कई जिलों में अजीब हालात पैदा हो गए। कुछ नए नियुक्त ज़िलाध्यक्षों ने पद स्वीकार करने से ही इनकार कर दिया, वहीं कई नेता सोशल मीडिया पर अपनी नाराज़गी खुलकर व्यक्त कर रहे हैं क्योंकि उनके नाम सूची में शामिल नहीं किए गए। कई स्थानों पर कार्यकर्ताओं ने विरोध में सामूहिक रूप से इस्तीफे तक सौंप दिए। जिस अभियान का उद्देश्य संगठन को मज़बूत करना था, वही अब पार्टी के लिए सिरदर्द बनता दिख रहा है।

पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट पर उठे सवाल, सिफ़ारिशों से तय हुए नाम?

इस अभियान के तहत ज़िलाध्यक्षों का चयन पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट के आधार पर किया जाना था, लेकिन पार्टी के भीतर से ही यह आवाज़ उठ रही है कि ये रिपोर्टें महज़ औपचारिकता बनकर रह गईं। आंतरिक सूत्रों के अनुसार, कई ज़िलाध्यक्षों के चयन में सिफ़ारिशों, दबाव और पक्षपात की भूमिका रही है, जिससे राहुल गांधी के संगठन निर्माण मिशन पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। यही कारण है कि अभी भी पाँच जिलों में ज़िलाध्यक्षों की घोषणा नहीं की गई है। चयन प्रक्रिया को लेकर बनी संदेह की स्थिति ने कार्यकर्ताओं और नेताओं दोनों के बीच असंतोष को और बढ़ा दिया है।

Rajasthan Congress: कांग्रेस के संगठन निर्माण अभियान में बवाल, ज़िलाध्यक्षों की सूची बनी पार्टी के लिए परेशानी

सबसे बड़ा विवाद धौलपुर में सामने आया, जहां बस्सेरी से कांग्रेस विधायक संजय कुमार जाटव को ज़िलाध्यक्ष नियुक्त किया गया। सूची जारी होते ही उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष को चिट्ठी लिखकर पद छोड़ने की इच्छा जताई। उन्होंने लिखा कि पारिवारिक और आर्थिक परिस्थितियों के कारण वह इस ज़िम्मेदारी को निभाने में सक्षम नहीं हैं। उनके इस्तीफे ने चयन प्रक्रिया पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। वहीं चूरू में भी हालात गर्म हैं। सुजानगढ़ से विधायक मनोज मेघवाल को ज़िलाध्यक्ष बनाया गया है, लेकिन सूत्र बताते हैं कि वे यह पद स्वीकार करने को तैयार ही नहीं थे। सूची जारी होने के बाद उन्होंने न नेतृत्व से संपर्क किया, न कोई प्रतिक्रिया दी। बताया जा रहा है कि नाराज़गी के चलते उनका फोन भी लगातार स्विच ऑफ है। इससे पार्टी के भीतर असहजता और गहरी हो गई है।

नाम छूटने पर नेताओं में नाराज़गी, कई जिलों में विरोध तेज

दूसरी ओर, वे नेता जो ज़िलाध्यक्ष बनने की उम्मीद लगाए बैठे थे, सूची में नाम न आने पर काफी नाराज़ हैं। कई जिलों में कार्यकर्ताओं ने संगठन के खिलाफ ज्ञापन देकर विरोध जताया है। यह स्पष्ट हो गया है कि कांग्रेस के लिए चुनौती केवल सूची जारी करना नहीं था, बल्कि उसके बाद पैदा हुई स्थिति उससे कहीं अधिक जटिल हो गई है। संगठन निर्माण अभियान, जिस पर पार्टी अपनी नई ताकत खड़ी करना चाहती थी, वह अब विवादों और असंतोष के कारण लड़खड़ाता हुआ दिख रहा है। यदि जल्द ही नेतृत्व उचित कदम नहीं उठाता, तो यह आंतरिक असंतोष कांग्रेस के लिए बड़े राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकता है।

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